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महंगाई मार गई

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Thu Jul 29 2010 21:45:31 GMT+0530 (India Standard Time)


सड़क से लेकर संसद तक महंगाई की मुखालफत होती रही है। कभी बंद के नाम पर तो कभी सड़कों पर उतरकर। हर विरोध का नतीजा मुसीबतों में इजाफा बनकर सामने आता रहा। महंगाई के बोझ तले दबी अवाम घुट घुटकर जी रही है। लेकिन हुकूमत को तो इस बोझ से ही ऐतराज़ है। संसद में विरोध की आवाजों को नजरंदाज़ करना उसकी नीयत को साफ करता है तो विपक्ष के लिए भी महंगाई मुद्दे से ज्यादा कुछ नहीं दिखती। लेकिन हकीकत तो यह है कि अवाम को मार गई महंगाई।

महंगाई की मार से आम जनता त्रस्त है। रसोई से लेकर थाली तक महंगाई डायन की तरह असर दिखा रही है। लेकिन खुशियों पर ग्रहण लगा रही ये महंगाई सरकार को अभी तक नज़र नहीं आई है। उसे तो महंगाई के वजूद से ही ऐतराज़ है। फिल्म में भले ही लग रहा हो कि महंगाई डायन खाए जा रही है, लेकिन हमारी सरकार तो फिलहाल यह मानने को तैयार ही नहीं है। कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ के मारे से सत्ता पाने के बाद अब उसकी मजबूरियां ऐसी हावी हो गई हैं कि उसे आम आदमी की रोटी की चिंता ही नहीं रह गई है। लोगों के घर का बजट बिगड़ा जा रहा है, लेकिन पूरे देश का बजट बनाने वाले हमारे वित्त मंत्री साहब हैं कि मानने को तैयार ही नहीं हैं।

हमारे घर के बिगड़ते बजट में उनका यानी सरकार का जरा भी दोष नहीं है। मुखर्जी साहब का कहना है कि सरकार को पेट्रोल- डीजल की कीमतें बढ़ाने से कोई सुख नहीं मिल रहा है। कुछ मजबूरियां होती हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें जिस तेजी से बढ़ी हैं, उसका असर हम पर भी पड़ा है। महंगाई सरकार की विफलता की वजह से नहीं है।‘ जब मुखर्जी साहब ऐसे बोल रहे हैं, तो भला सरकार से बाहर कांग्रेस की ओर बोलने का जिम्मा संभालने वाले प्रवक्ता मनीष तिवारी कहां पीछे रहने वाले थे। वे कह रहे हैं कि महंगाई तो कोई मुद्दा ही नहीं है। वह तो विपक्ष खासकर बीजेपी अमित शाह के मामले को दबाने के लिए महंगाई पर इतना हंगामा कर रही है।

अब जब पूरी सरकार महंगाई को नकारने पर तुली हो, तो भला देश में खाने- पीने के सामानों के पैदावार से लेकर बाजार तक पहुंचाने के जिम्मेदार अकेले मंत्री पवार साहब इसे क्यों मानते? पवार साहब तो गेहूं के सड़ने की खबरों के मीडिया में आने से भी बेहद नाराज थे। वे कह रहे थे कि मीडिया बेवजह इसे बात का बतंगड़ बना रहा है। खैर, पवार साहब मीडिया की बात भले न सुनें लेकिन, उन्हें अपने पुराने दोस्त लालू प्रसाद यादव की बात तो सुन ही लेनी चाहिए। अब जब हालात बेकाबू हैं, तो पवार साहब भरोसा दिला रहे हैं महंगाई जल्द ही कम हो जाएगी। अब तक जो दिख रहा है, उसमें सरकार की दावे और वादे करने के सिवाय कुछ करने की मंशा तो दिख नहीं रही है। लोगों को अब भगवान भरोसे ही महंगाई कम होने का इंतजार करना होगा।

महंगाई के बहाने बीजेपी अब कांग्रेस पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाह रही है। वजह बेवजह भी नहीं है। यह महंगाई ही थी जिस पर दिल्ली में हुई रैली के बाद राजनीतिक विश्लेषक फिर से बीजेपी के आधार लौटने की उम्मीद भी दिखाने लगी। बीजेपी भी इसी उम्मीद में विपक्षी एकता के दम पर संसद में अविश्वास प्रस्ताव लेकर चली आई। लेकिन, यहीं पर असली राजनीतिक खेल शुरू हो गया। महंगाई के मुद्दे पर सरकार को कोसने वाली इन पार्टियों को फिर सांप्रदायिकता का भूत बड़ा दिखने लगा।

यहां तक कि वामपंथी दल भी बीजेपी के साथ खड़े दिखे। लेकिन, इन क्षेत्रीय पार्टियों की अपनी राजनीति थी। लालू- पासवान की जोड़ी को बिहार में महंगाई के बहाने एनडीए के मजबूत होने का खतरा दिखने लगा तो समाजवादी पार्टी को यूपी की चिंता सताने लगी। उत्तर प्रदेश में राज कर रही बहुजन समाज पार्टी ने भी आम जनता के साथ दिखने के लिए महंगाई के विरोध में धरना प्रदर्शन किया, लेकिन सबसे अलग। अब एक बार फिर से बीजेपी की अगुवाई में विपक्ष महंगाई पर बहस कराना चाह रहा है। लेकिन, सरकार वोटिंग वाले प्रावधान के तहत बहस कराने को तैयार नहीं है।

अमित शाह मामले पर किरकिरी झेल रही बीजेपी महंगाई के मुद्दे पर पूरे विपक्ष को साथ लेकर सरकार को सांसत में डालना चाहती है। मुश्किल यह है कि लालू-मुलायम-पासवान और लेफ्ट बिल्कुल भी नहीं चाहेगा कि इस बहाने बीजेपी को एक बार फिर से मजबूती मिले। इसीलिए महंगाई के खिलाफ सारी राजनीतिक पार्टियां अलग- अलग हल्ला तो कर रही हैं, साथ ही एक होकर महंगाई से निजात का रास्ता नहीं निकाल रहीं।

बढती महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है। दिनचर्या की वस्तुओं के दाम अब आसमान छू रहे हैं। लोगों को अपनी बजट को संतुलित करने के लिए रोजमर्रा के सामानों की खरीद में कटौती करना पड़ रही है, लेकिन सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। लोगों की सरकार के प्रति मंहगाई को लेकर नाराजगी अब बढ़ने लगी है। दिनों- दिन बढ़ती महंगाई ने आम आदमी का जीना मुहाल कर रखा है। आलम यह है कि चावल दाल और आटे जैसी रोजमर्रा की रसोई से जुड़े सामानों के दाम भी आसमान छूने लगे हैं। मजबूरी में जरूरत की चीजों की खरीदारी लोग कम कर रहे हैं और इसका सीधा सा असर चीजों की बिक्री पर भी पड़ रहा है। भोपाल में जो आटा अप्रैल में 199 रुपए प्रति दस किलो की रेट पर मिलता था, जुलाई महीने में उसकी कीमत 205 रुपए तक पहुंच गई।

साधारण चावल जो 20 प्रति किलो की दर पर मिलता था, जुलाई में उसकी कीमत 24 रुपए तक पहुंच गई। वहीं 60 रुपए में मिलने वाली दाल जुलाई में 69 रुपए में खरीदनी पड़ रही है। ऐसे में पेट्रोल डीजल के दामों में हुई बढ़ोत्तरी ने तो गाड़ियों के ब्रेक लगाने का ही काम किया है और इसका सीधा असर पड़ रहा है आम उपभोक्ताओं पर। रायपुर में भी खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ने से आम आदमी की जेब पर डाका पड़ रहा है। आलम यह है कि हरी सब्जियों के साथ- साथ अनाज विक्रेताओं और उनके खरीदारों में सरकार की नीतियों और बढ़ती महंगाई दोनों के खिलाफ जमकर गुस्सा दिख रहा है। महंगाई की मार झेल रहे मुल्क के तकरीबन सभी हिस्सों में यही नजारा देखने को मिल रहा है। लेकिन महंगाई से निजात दिलाने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर है, बस उस सरकार को ही महंगाई नजर नहीं आ रही है और इसका खामियाज़ा उसे भुगतना पड़ रहा है जिनकी खातिर और जिनके जरिए सरकारें बनती हैं।

महंगाई की मार केवल घर की रसोई और आम खरीद की चीजों पर ही नहीं पड़ी है, बल्कि असर उस तबके पर भी पड़ रहा है जिसे हर रोज़ अपने काम काज़ से घर से बाहर ऑटो या रिक्शॉ जैसे साधनों से जाना पड़ता है। महंगाई का असर चौतरफा है। पेट्रोल और डीज़ल के दामों में हुई बढ़ोत्तरी तो हर तरफ अपना असर दिखा ही रही है, कई इलाकों में बाढ़ ने भी अपना असर दिखाया है। उस पर माल ढुलाई में हो रही दिक्कतों ने तो इस समस्या में कोढ़ में खाज का ही काम किया है। देश के तकरीबन हर हिस्से में महंगाई अपने चरम पर है और आम आदमी इन तमाम परेशानियों के साथ जीने पर मजबूर।

पंजाब और हरियाणा में भी महंगाई का कहर जारी है। इस पर कई इलाकों में आई बाढ़ और ट्रांसपोटेशन में आ रही दिक्कतों ने इस मुसीबत में इजाफा ही किया है औऱ इसका सीधा असर पड़ा है। अनाज के साथ- साथ फलों औऱ सब्जियों के दामों पर। महंगाई की मार से धर्म नगरी वाराणसी भी अछूती नहीं है। लोगों में महंगाई को लेकर इतना गुस्सा है कि बस पूछिए मत। महंगाई के खिलाफ हजारों लोग बुधवार को सड़क पर उतर आये। इस दौरान लोगों ने 25 किलोमीटर लम्बी मानव श्रृंखला बनाकर महंगाई के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। सबसे खास बात यह रही कि इस रैली में स्कूलों के बच्चे, महिलायें और एनजीओ के लोग भी शिरकत कर रहे थे।




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