Fri Jul 30 2010 22:04:51 GMT+0530 (India Standard Time)
कहा जाता है जुर्म की दुनिया में किसी की बादशाहत तभी तक कायम रहती है जब तक उसकी जेब में दौलत हो और हाथों में हथियार। दौलत के दम पर जरायम की दुनिया के शातिर खिलाड़ी सलाखों के पीछे भी खेल रहे हैं मौत का खेल। आखिर कैसे चलती है सलाखों के पीछे सरगनाओं की हुकूमत?
हर गुनाह की सजा जेल। हर जुर्म की सजा जेल। कानून की किताब को अगर हकीकत माना जाय तो जेल वह जगह है जहां पहुंचकर हर अपराधी अपने गुनाह से तौबा कर लेने की कसम खाता है। वह सौगंध खाता है कि जेल की जिंदगी से आजाद होने के बाद वह कभी गुनाह के रास्ते पर नहीं चलेगा। लेकिन कानून की किताब से अलग एक स्याह हकीकत यह है कि आज के दौर में जरायम की दुनिया के हर बड़े और शातिर खिलाड़ी की ख्वाहिश होती है जेल की जिंदगी। गुनहगारों की किताब में जेल ही वह महफूज ठिकाना होता है जहां से चलाना चाहता है अपनी बादशाहत।
अपनी हुकूमत, हुकूमत हर कीमत पर। यह पहली ख्वाहिश होती है हर उस गुनहगार की जो जरायम की दुनिया में एक मुकाम हासिल करना चाहता है और सच भी शायद यही है कि जुर्म के तालाब की बड़ी मछलियों के लिए जेल की जिंदगी किसी जन्नत से कम नहीं। असलियत यही है कि जुर्म की दुनिया का हर सरगना आज जेल में बैठकर बाहर की दुनिया में अपनी हुकूमत चलाना चाहता है और बहुत हद तक उसकी यह चाल कामयाब भी होती है। हो भी क्यों न, बाहर की दुनिया का भाई जेल में भी भाई ही होता है। उन लोगों का जो ताल्लुक रखते हैं गुनाह से और उन लोगों का भी जिनका फर्ज है गुनाह को रोकना।
जी हां, कानून के वह नुमाइंदे भी भाई के हुक्म के आगे नतमस्तक होते हैं और यही वजह है कि जेल में बैठकर भी जयराम की दुनिया में इनकी दुकान बेखौफ चलती है। जरायम की दुनिया की बेखौफ जिंदगी कभी- कभी उन भाईयों के लिए खौफ का सबब बन जाती है जो जेल की सलाखों में कैद होकर भी बाहर की दुनिया में अपनी हुकूमत कायम रखने की ख्वाहिश लिए बैठे हैं। जी हां, हुकूमत के नाम पर किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। जरायम की दुनिया के सरगना चाहे वह जेल हो या फिर जेल के बाहर।
हुकूमत के नाम पर एक दूसरे पर जानलेवा वार, सलाखों के पीछे गैंगवार की कहानी बेशक बहुत पुरानी है। लेकिन अबू सलेम पर हुए हमले ने एक बार फिर जेल में होने वाले गैंगवार को हवा दे दी है। डी कंपनी अपनी चाल चलने को तैयार है और छोटा राजन के गुर्गे उसकी हर चाल को मात देने की कोशिश में आखिर कैसे चल रहा है यह सब?
सपनों को बिखरते हुए देखा है यहां, उम्मीदों को सिमटते हुए देखा है यहां? सुना है यहां बिगड़ों को सुधारा जाता है। मगर सुधरे हुए को बिगड़ते देखा है यहां। हिन्दुस्तान की जेलों के बारे में कहा जाता है कि यहां जेब काटने वाला सजा काटने आता है और जब बाहर निकलता है तो उसके पास गला काटने की कूबत होती है और इस सबके पीछे की वजह बनते हैं वे लोग जिसे गुनहगारों की जमात भी अपना सरदार मानती है। जी हां, यह वो हकीकत है जो कमोवेश हर जेल का है। हुकुमत की लड़ाई में जेल में बैठे गुनाह की दुनिया के आका न एक दूसरे का सर कलम करने से भी पीछे नहीं हटते।
जेल के अंदर वे तैयार करते हैं उन गुनहगारों की फौज जो जेल से निकलकर उनके लिए किसी का सिर कलम करने को रहते हैं तैयार और इस सबके पीछे होती है दौलत की भूख। मुंबई के ऑर्थर रोड जेल में हालिया वारदात की कहानी के पिछले पन्नों का जिक्र करें तो यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि दोस्त ने दोस्त का खून बहाया है। लेकिन यह भी सच है कि सलेम और दौसा के बीच छिडी जंग के पीछे की वजह दौलत ही है। दौलत की खातिर एक दोस्त ने दूसरे का खून बहाया। जी हां, वही मुस्तफा दौसा जो कभी अबू सलेम के साथ डी कंपनी का वफादार माना जाता था।
आज वही सलेम के जान का दुश्मन बन गया है। हालांकि अदालत में दौसा ने अपने उपर लगे तमाम आरोपों से इनकार किया है। कोर्ट में दौसा ने जो बयान दिया उसकी हकीकत को मानें तो दौलत की खातिर अबू सलेम ने एक चाल चली है। अब ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ? लेकिन सवाल उठता है कि आखिर अबू सलेम पर हमले की हिम्मत आखिर किसकी है। हकीकत चाहे जो भी हो, लेकिन जानकारों ने एक बार फिर कहना शुरू कर दिया है कि एक बार फिर गैंगवार का आगाज़ हो चुका है। हुकूमत की खातिर शुरू हो चुका है खूनी खेल जो कि आने वाले दिनों में पुलिस के बन सकता है सिरदर्द।
सात साल पहले सलाखों के पीछे शुरू हुआ गैंगवार थमने का नाम नहीं ले रहा। हर सरगना एक दूसरे को मात देने की फिराक में है। लेकिन शह और मात के इस खेल में कभी कभार हो जाती है किसी की मौत। आखिर कब से शुरू हुआ सलाखों के पीछे गैंगवार का खूनी खेल? जेल में गैंगवार, हुकूमत के लिए आपस में ही चलती है गोलियां और फिर ढेर हो जाता है कोई न कोई सरगना। यूं तो गैंगवार की कहानी कमोवेश हिन्दुस्तान के हर जेल की है। लेकिन जुर्म की दुनिया में अपनी बादशाहत बरकरार रखने के नाम गैंगवार के लिए कुछ जेलें बदनाम है।
मसलन ऑर्थर रोड जेल, नासिक जेल, ठाणे जेल और इसके पीछे की वजह है इन जेलों में अंडरवर्ल्ड सरगनाओं की बादशाहत। कहा तो यह भी जाता है कि जेल में बैठकर ही सरगना बाहर की दुनिया की कीमत तय करते हैं। यह सच भी है और यही वजह बन जाती है गैंगवार की। यूं तो अंडरवर्ल्ड के बीच हुकूमत की लड़ाई काफी पुरानी है लेकिन जेल में गैंगवार की कहानी सबसे पहले सामने आई थी अब से करीब 7 साल पहले। जी हां, साल 2003 में और अंडरवर्ल्ड के इतिहास में जेल के भीतर गैंगवार की पहली इबारत लिखी गई नाशिक जेल में।
जब अंडरवर्ल्ड सरगना छोटा राजन ने अपने खास वफादार से दुश्मन बन चुके ओम प्रकाश सिंह उर्फ ओ पी सिंह की हत्या करवा दी। ओपी की खता बस इतनी थी कि वह छोटा राजन से अलग होने के बाद डी कंपनी से हाथ मिला चुका था। अपने दोस्त की गद्दारी राजन को नागवार गुजरी और उसने अपने वफादार साथी डी के राव की मदद से ओपी को दे दी मौत। ओपी की मौत डी कंपनी के लिए एक बडा झटका था और यह बात किसी से छिपी भी नहीं थी कि हत्या छोटा राजन ने कराई है। कहा तो यह भी जाता है कि छोटा राजन ने इस काम के लिए डी के राव समेत अपने 13 गुर्गों को नाशिक जेल भेजा था और हर किसी को एक एक लाख रुपये दिये गए थे।
ऐसा नहीं है कि ओम प्रकाश सिंह की हत्या की साजिश से कानून बेखबर था बल्कि कहा तो यह भी जाता है कि कानून के रखवालों ने भी ओपी की हत्या में राजन की मदद की थी। लेकिन वही मदद कानून के नुमाइंदों के गले की फांस भी बन गई, क्योंकि उस घटना के बाद ही जेल में बंद हर सरगना बदले की आग में जलने लगा और जिसकी तपिश हर किसी ने महसूस की। बदले की आग में सब जल रहे थे। छोटा राजन अपने वफादार साथी को उसकी गद्दारी की सजा दे चुका था। लेकिन ओपी की मौत के बाद हर एक सरगना बदले की आग में जलने लगा और इसकी लपटें बहुत जल्द ही दूसरे जेल में भी पहुंच गई।
फिर शुरू हुआ सलाखों के पीछे मौत का वह सिलसिला जो आज भी बदस्तूर जारी है। बदले की आग, हुकुमत के नाम पर खून खराबा। यह वो हकीकत थी जिसे अंजाम दिया जाता है सलाखों के पीछे से और इस सबके पीछे होते हैं जुर्म की दुनिया का वह सरगना जिनके हुक्म की मुखालफत करना कानून के नुमाइंदों के भी बूते की बात नहीं। यही वजह है कि जेल के भीतर से ये बेखौफ चलाते हैं अपने खौफ की दुकान। नाशिक जेल में ओपी सिंह की हत्या के बाद बदले की आग में अंडरव्लर्ड सरगना दाउद इब्राहिम कास्कर और छोटा राजन के गिरोह के बीच जम कर खून खराबा हुआ।
साल 2003 में ओपी सिंह की हत्या के बाद जुर्म की दुनिया का हर एक सरगना बदले की आग में जल रहा था। पुलिस भी इससे बेखबर थी। बावजूद इसके बदले की आग में छिड़ी जंग को रोक पाने की कूवत कानून के रखवालों में नहीं था। बदले की आग की लपट पहुंची मुंबई के ऑर्थर रोड जेल में। यह ऐसा वक्त था जब डी कंपनी के कई कुख्य़ात सरगना ऑर्थर रोड जेल में बंद थे और हर वक्त अपने दुश्मन छोटा राजन के गैंग से दो- दो हाथ करने को तैयार थे। नतीजा भी जल्द ही सामने आ गया। जब ऑर्थर रोड जेल में भी लिखी गई खूनी इबारत डी कंपनी के गुर्गों ने छोटा राजन के वफादार साथी रॉबर्ट डिसूजा को मौत के घाट उतार दिया।
अपने वफादार साथी की मौत से बौखलाए छोटा राजन ने भी कुछ दिन बाद ही दाउद के खासमखास माने जाने वाले असगर अली मेंहदी की हत्या कर अपना बदला पूरा किया। हैरानी की बात तो यह है कि असगर अली मेंहदी का कत्ल भी ऑर्थर रोड जेल में ही किया गया था। साल 2008 में भी ऑर्थर रोड जेल के भीतर डी कंपनी के गुर्गों और राजन के साथियों के बीच हुए खून खराबे की हकीकत किसी से छिपी नहीं है। लेकिन एक सच तो यह भी है कि वक्त के साथ न सिर्फ दिलों का बंटवारा हुआ, बल्कि आपस में हर एक शख्स अलग- अलग अपना गिरोह चलाना शुरू कर दिया और हकीकत से बेखबर होने के बावजूद भी कानून के नुमाइंदे न सिर्फ तमाशा देखते रहे बल्कि उन सरगनाओं के मददगार भी साबित होते रहे।
हुकूमत हर कीमत पर। यही वह सच है जिसकी खातिर सलाखों के पीछे कैद जुर्म की दुनिया के शातिर खिलाड़ी कुछ भी करने को तैयार है। बाहर की दुनिया भले ही कितनी भी रंगीन क्यों न हो, सलाखों के पीछे कैद होकर भी सरगनाओं की जिंदगी कम रंगीन नहीं है। लेकिन सवाल उठता है कि यह सब कानून के रखवालों के सामने कैसे मुमकिन है? जेल के कायदे- कानून क्यों दम तोड़ रहे हैं? जी हां, कानून के रखवाले सलाखों के पीछे कैद अंडरवर्ल्ड सरगनाओं के कमीशन एजेंट बन चुके हैं और जब कानून की ताकत को दौलत के तराजू में तौला जाता है तो हर वक्त पलड़ा दौलत का ही भारी होता है। यही वजह है कि कानून के नुमाइंदे अपना फर्ज भूल कर सरगनाओं के हुक्म की तामील करने में लगे हैं। और जब सलाखों के पीछे रहकर भी सब मुमकिन हो तो भला सरगना अपनी हुकूमत बरकरार रखने के लिए क्या कुछ नहीं कर सकते!